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भारत का स्वाभिमान – आई. एन. एस विक्रांत

भारतीय नौसेना ने हाल ही में विमान वाहक युद्धपोत आई. एन. एस विक्रांत का समुद्री परीक्षण सफलता पूर्वक पूरा किया है। क्या है, यह विमान वाहक युद्धपोत आई. एन. एस विक्रांत? क्यों यह भारत के लिए आवश्यक है? और क्यों हमने इसे भारत का स्वाभिमान कहा, आइये जानते हैं इन तथ्यों के आधार पर-

  • आई.एन.एस. विक्रांत भारत का पहला स्वदेश निर्मित विमान वाहक युद्धपोत है। इसके 75% अवयव भारत में ही निर्मित हैं। इसका प्रारूप डायरेक्टरेट ओफ़ नवल डिज़ाइन द्वारा तैयार किया गया है। जबकि इसका निर्माण भारत सरकार द्वारा अनुमति प्राप्त कम्पनी कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड द्वारा किया गया है।
  • विक्रांत समुद्र में तैरती हुई एक हवाई पट्टी की तरह है। इसकी लम्बाई 262 मी. जबकि चौड़ाई 62 मी है।
  • विमान वाहक युद्धपोत की भाषा में हैंगर पोत में एक ऐसा स्थान होता है जहां पर विमानों को रखा जाता है। विक्रांत के हैंगर में एक साथ 30 विमानों को रखा जा सकता है। हैंगर से उड़ान पट्टी तक ले जाने के लिए स्वचालित लीफ्ट का प्रयोग किया जाता है।
  • आई. एन. एस विक्रांत के फ्लाइट डेक पर दो विमान पट्टियां हैं जिससे दो युद्धक विमान एक साथ उड़ान भर सकते हैं।
  • 40,000 टन वज़नी विक्रांत की अधिकतम गति 28 क्नॉट्स अर्थात 52 किलोमीटर प्रति घंटा है। अपनी इस गति के साथ यह पोत भारत की 7500 किलोमीटर लंबी समुद्री रेखा को बिना अतिरिक्त ईंधन की आवश्यकता के दो बार तय कर सकता है।
  • आई. एन. एस. विक्रांत के निर्माण में कुल 23000 करोड़ का निवेश किया गया है। इसके निर्माण में इतने स्टील का उपयोग किया गया है जिससे कि तीन एफल टावर का निर्माण किया जा सके।
  • यदि विक्रांत को भारत के स्वाभिमान का प्रतीक कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी क्योंकि भारत ने इसे अपने ही दम पर निर्मित किया है। इसके निर्माण में 50 भारतीय निर्माणी संस्थान प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं। जबकि इस परियोजना के माध्यम से 2000 भारतीय नागरिकों को प्रत्यक्ष रोज़गार प्राप्त हुआ है। इसके साथ ही भारत उन विशिष्ट देशों के समुह में शामिल हो गया है जिनके पास स्वयं का विमान वाहक युद्ध पोत है। ऐसा करने वाला भारत विश्व का छँटवा देश है।
  • आई. एन.एस. विक्रांत पर देश के जांबाज़ सैनिकों की सुविधा के लिए 2300 कक्षों का निर्माण किया गया है। साथ ही महिला सैनिकों के लिए पृथक कक्षों की व्यवस्था की गई हैं।
  • इस विमान वाहक युद्धपोत पर मिग-29, कामोव-31, एम. एच्. -60 आर जैसे युद्धक वायुयान एवं हेलीकॉप्टर की नियुक्ति की जाएगी।

भारत के लिए क्यों आवश्यक है आई.एन.एस विक्रांत?

किसी भी देश की अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए उसकी सीमा की रक्षा आवश्यक होती है। भारत की समुद्री सीमा 7500 किलोमीटर लंबी है। इसके अलावा समुद्र में दूरस्थ स्थित अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह एवं लक्षद्वीप समूह की रक्षा भी अपने आप में एक चुनौती पूर्ण कार्य है। एक विमान वाहक युद्धपोत, स्वामित्व वाले देश की, समुद्र में हवाई पट्टी के समान होता है। यह विशाल समुद्र में युद्धक विमानों के लिए आश्रय स्थल होता हैं जो एक बार में अनेक विमानों को अपने में जगह दे सकता है। वर्तमान में भारत के पास एकमात्र विमान वाहक युद्धपोत आई.एन. एस.विक्रमादित्य उपलब्ध है। लेकिन एकमात्र युद्वपोत से 7500 किलोमीटर लंबी समुद्री सीमा की रक्षा अपने आप में एक दुःसाध्य कार्य है। साथ ही समुद्री क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने में भी एक विमान वाहक युद्धपोत महत्त्वपूर्ण है।और इस कार्य को आई.एन.एस. विक्रमादित्य बड़ी ही कुशलता से सम्पन्न कर सकता है।

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